Wednesday, December 25, 2013

Great Initiative in e-Governances

Today India Fighting against Corruption and Transparent Governance and this is time demanding we change our style of Functioning in Public Sector. Today Best way of Transparent Governance is e-Governance. after the e-revolution in India under Atal-Bihari Vajpayee leadership. NDA Government want to develop a system for transparent and accountable governance. in this process Government of India take steps for e-governance.

Story of e-Revolution in India

Several dimension and factors influence the definition of e-Governance. The word “electronic” in the term e-Governance implies technology driven governance. E-Governance is the application of information and communication technology (ICT) for delivering government services, exchange of information, communication transactions, integration of various stand-alone systems and services between

1 Government-to-Citizens (G2C),
2 Government-to-Business(G2B),
3 Government-to-Government( G2G)

As well as back office processes and interactions within the entire government frame work.Through the e-Governance, the government services will be made available to the citizens in a convenient, efficient and transparent manner. in India many States are Adopted e-Governance but Best Model of e-Governance in Various Indian States was Gujarat e-Governance model.



Status of Gujarat :-

Awarded for Best e-Governance, Gujarat is a front-line State in the implementation of e-governance policies & projects and setting up of key infrastructure for e-Governance. Gujarat Government promotes information sharing with the citizen by way of display and disclosure of information of large number of functional departments and their subordinate organizations through their respective websites which act as ‘Information tools’ in the State.

State Govt. has adopted Innovative, constructive and result oriented progressive policies for the promotion of e-governance in the State. Through the Nodal Agency, the Government’s Science and Technology Department positions Gujarat, as a Key State in the Knowledge Economy sector and acts as a medium to make Government-Citizen Interface more effective, transparent and efficient.

A Documentary on e-Governance in Gujarat :- 



Top Initiatives Development in Gujarat :-

01. Gujarat State Data Centre
02. GSWAN (Gujarat State Wide Area Network)
03. SWAGAT Online (State Wide Attention on Grievances through Application of Technology)
04. ICT and e readiness Initiatives
05. SICN (Sachivalya Integrated Communication Network)
06. e-Procurement
07. GVATIS
08. IWDMS (Integrated Workflow and Document Management System)
09. e-City
10. Health Management Information System (HMIS)
11. e-Dhara
12. e-Gram – Vishvagram
13. e-Mamta







Wednesday, December 4, 2013

कश्मीर का विलय और अनुच्छेद 370


म्मू-कश्मीर रियासत, जिसका विलय 26 अक्तूबर 1947 को भारतीय संघ में हुआ, वह आज के भारत द्वारा शासित जम्मू-कश्मीर राज्य से कहीं अधिक विशाल था। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर रियासत के निम्न हिस्से हैं :-

एक परिचय जम्मू और कश्मीर क्षेत्र का

1. जम्मू -   सका क्षेत्रफल कुल 36,315 वर्ग कि.मी. है जिसमें से आज हमारे पास लगभग 26 हजार वर्ग कि.मी. है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से युक्त पीर पंजाल पर्वत के दक्षिण में इस क्षेत्र में तवी और चेनाब जैसी बारहमासी नदियां बहती हैं। यहां की वर्तमान जनसंख्या का लगभग 67 प्रतिशत हिन्दू है। मुख्य भाषा डोगरी व पहाड़ी है।

2. कश्मीर घाटी- गभग 22 हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल, जिसमें से लगभग 16 हजार वर्ग कि.मी. ही हमारे पास है। वर्तमान में अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम है, लगभग 4 लाख हिन्दू वर्तमान में कश्मीर घाटी से विस्थापित हैं। जेहलम और किशनगंगा नदियों में जाने वाली जलधाराओं से बना यह क्षेत्र दो घाटियों जेहलम घाटी एवं लोलाब घाटी से मिलकर बना है। मुख्यत: कश्मीरी भाषा बोली जाती है, परन्तु एक तिहाई लोग पंजाबी-पहाड़ी बोलते हैं।

3. लद्दाख क्षेत्र- कुल 1,01,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र, जिसमें से लगभग 59 हजार वर्ग कि.मी. भारत के अधिकार में है। प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ ही बड़ी संख्या में बौद्ध मठ यहां हैं जहां दुनिया के कोलाहल से दूर शांति का अनुभव किया जा सकता है।  गॉडविन आस्टिन (K 28611 मीटर) और गाशरब्रूम I (8068 मीटर) सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ हैं। यहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क एवं कठोर है। वार्षिक वृष्टि 3.2 इंच तथा वार्षिक औसत ताप 5 डिग्री सें. है। नदियाँ दिन में कुछ ही समय प्रवाहित हो पाती हैं, शेष समय में जमी रहती है। सिंधु मुख्य नदी है। उत्तर में कराकोरम पर्वत तथा दर्रा है। कारगिल में 9000 फुट से लेकर कराकोरम में 25000 फुट  ऊंचाई तक की पर्वत श्रंखलायें है।

01 जुलाई 1979 को लद्दाख का विभाजन कर लेह और करगिल; दो जिलों का गठन किया गया। पश्चिम बंगाल के गोरखालैंड की तर्ज पर दोनों जिलों का संचालन ‘स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ द्वारा किया जाता है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, लद्दाख की कुल जनसंख्या 236539 और क्षेत्रफल 59146 वर्ग कि.मी. है। यह भारत के सबसे विरल जनसंख्या वाले भागों में से एक है।

4. गिलगित-वाल्टिस्तान- म्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने विधिवत अपना प्रांत घोषित कर उसका सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया है। यह लगभग 63 हजार वर्ग किमी. विस्तृत भू-भाग है जिसमें गिलगित लगभग 42 हजार वर्ग किमी. व वाल्टिस्तान लगभग 20 हजार वर्ग किमी. है। गिलगित का सामरिक महत्व है। यह वह क्षेत्र है जहां 6 देशों की सीमाएं मिलती हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, चीन, तिब्बत एवं भारत। यह मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया में प्रभुत्व रखा जा सकता है।

अमेरिका भी पहले गिलगित पर अपना प्रभाव रखना चाहता था और एक समय चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिये सोवियत रूस की भी ऐसी ही इच्छा थी, इसलिये 60 के दशक में रूस ने पाकिस्तान का समय-समय पर समर्थन कर गिलगित को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया था। वर्तमान में गिलगित में चीन के 11000 सैनिक तैनात हैं। पिछले वर्षो में इस क्षेत्र में चीन ने लगभग  65 हजार करोड़ रूपये का निवेश किया व आज अनेक चीनी कंपनियां व कर्मचारी वहां पर काम कर रहे हैं।

1935 में जब सोवियत रूस ने तजाकिस्तान को रौंद दिया तो अंग्रेजों ने गिलगित के महत्व को समझते हुये महाराजा हरिसिंह से समझौता कर वहां की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने के लिये 60 वर्ष के लिये इसे पट्टे पर ले लिया। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने इसकी सुरक्षा के लिये महाराजा को वापिस कर दिया।

राज्य में लोकसभा की 6 और विधानसभा की 87 सीटें हैं जिसमें लद्दाख में लोकसभा की एक और विधानसभा की 4 सीटें हैं। करगिल और लेह जिले में विधानसभा की दो-दो सीटें है; जिनके नाम क्रमशः जांस्कर व कारगिल और नोब्रा व लेह है। दोनों जिले करगिल और लेह लद्दाख लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या 65 लाख से ज्यादा है; जिसमें करीब 1,52,339 मतदाता लद्दाख में हैं।
करगिल के मुसलमान पक्के देशभक्त माने जाते हैं और 1999 में पाकिस्तान द्वारा कारगिल घुसपैठ के दौरान उन्होंने भारतीय सेना का खुलकर साथ दिया था। लद्दाख को चीन पश्चिम तिब्बत कहता है और सिन्धु नदी तक अपनी सीमा को बढ़ाना चाहता है। 1950 से ही इस क्षेत्र पर उसकी नजर है। लेह, जंस्कार, चांगथांग, नुब्रा, यह चार घाटियां बौध्दबहुल व सुरू घाटी पूर्णतया मुस्लिम बहुल है।

1947 में स्वाधीनता के समय जम्मू-कश्मीर कि स्थिति :-

1. भारत की पांच ऐसी रियासतों में से एक, जिसकी व्यवस्था सीधे ही भारत के वायसराय गवर्नर जनरल देखते थे। अंग्रेजों ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा (हरिसिंह बहादुर) के लिये 21 तोपों की सलामी की मान्यता दे रखी थी। ऐसी ही व्यवस्था मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर व हैदराबाद के शासकों के लिये थी।
2. भारत की सबसे बड़ी रियासत थी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 2 लाख 22 हजार वर्ग किमी. था। यह क्षेत्रफल बम्बई प्रेजीडेंसी से 2/3 अधिक एवं बीकानेर, ग्वालियर, बड़ौदा व मैसूर चारों रियासतों को कुल मिलाकर भी उनसे अधिक था।
3. यह भारत की एकमात्र रियासत थी जो मुस्लिम बहुल (लगभग 76 प्रतिशत) थी परन्तु जिसमें हिन्दू राजा था। इसके विपरीत देश में ऐसी बहुत सी रियासतें थीं जो हिन्दू बहुल थीं परन्तु मुस्लिम शासक द्वारा शासित थीं। सामान्यत: डोगरा शासक न्यायसम्मत तथा सुसंगत शासन के कारण जनता में लोकप्रिय थे।
4. इस रियासत की सीमायें अफगानिस्तान, तजाकिस्तान (तत्कालीन सोवियत संघ), चीन व तिब्बत से मिलती थीं।
5. अंग्रेजों ने एक अनियमित सैनिक बल गिलगित स्काउटस का भी गठन किया।

जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय :-         

17 जून 1947 को भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। 18 जुलाई को इसे शाही स्वीकृति मिली जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तथा उसके एक भाग को काट कर नवगठित राज्य पाकिस्तान का उदय हुआ।

पाकिस्तान के अधीन पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत एवं सिंध का भाग आया। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहा शेष भू-भाग भारत के साथ रहा।

इस अधिनियम से ब्रिटिश भारत की रियासतें अंग्रेजी राज से तो मुक्त हो गईं, परन्तु उन्हें राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला और उन्हें यह सुझाव दिया गया कि भारत या पाकिस्तान में जुड़ने में ही उनका हित है। इस अधिनियम के लागू होते ही रियासतों की सुरक्षा की अंग्रेजों की जिम्मेदारी भी स्वयमेव समाप्त हो गई।

भारत शासन अधिनियम 1935, जिसे भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 में शामिल किया गया, के अनुसार विलय के बारे में निर्णय का अधिकार राज्य के राजा को दिया गया। यह भी निश्चित किया गया कि कोई भी भारतीय रियासत उसी स्थिति में दो राष्ट्रों में से किसी एक में मिली मानी जायेगी, जब गवर्नर जनरल उस रियासत के शासन द्वारा निष्पादित विलय पत्र को स्वीकृति प्रदान करें। और साथ में भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 में सशर्त विलय के लिये कोई प्रावधान नहीं था।

26 अक्तूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत वर्ष में जम्मू-कश्मीर का विलय उसी वैधानिक विलय पत्र के आधार पर किया, जिसके आधार पर शेष सभी रजवाड़ों का भारत में विलय हुआ था तथा भारत के उस समय के गवर्नर जनरल माउण्टबेटन ने उस पर हस्ताक्षर किये थे…. ”मैं एतद्द्वारा इस विलय पत्र को स्वीकार करता हूं”  दिनांक सत्ताईस अक्तूबर उन्नीस सौ सैंतालीस (27 अक्तूबर-1947)

Full Text of Accession   Merger-related information

                                                                              
                                                  कश्मीर के भारत संघ में विलय का पत्र

 महाराजा हरिसिंह द्वारा हस्ताक्षरित जम्मू-कश्मीर के विलय पत्र से संबंधित अनुच्छेद, जो कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को पूर्ण व अंतिम दर्शाते हैं।

विलय पत्र में अनुच्छेद-1 के अनुसार, जम्मू-कश्मीर भारत का स्थायी भाग है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है। भारत संघ कहने के पश्चात दी गई राज्यों की सूची में जम्मू-कश्मीर क्रमांक-15 का राज्य है।

भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 के अनुसार शासक द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त आपत्ति करने का अधिकार पंडित नेहरू, लार्ड माउण्टबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना, इंग्लैंड की महारानी, इंग्लैंड की संसद तथा संबंधित राज्यों के निवासियों को भी नहीं था।  

जब कश्मीर का विलय जो भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 के अनुरूप था और जिसका विरोध और उसमे बदलाव का अधिकार किसी को नहीं था तथा विलय के मुख्य अधिकारी और प्रमुख निर्णय-कर्ता वहाँ के महाराज थे और पूरी सहमति से ये विलय भारत में हुआ तो उस विलय को पूर्ण माना जाना चाहिए।


अर्थात कश्मीर का पूर्ण विलय भारत गणराज्य में भारत के संविधान के निर्माण से पहले हो चूका था। भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर, 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 से प्रभावी हुआ।तो क्यों भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370  को सामने लाया गया ?

साथ में इन लिंक भी देखे :-

01. अनुच्छेद-370 और उससे जुडी समस्याए
02. अनुच्छेद-370 पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कुछ प्रश्न "देश चाहता है इन सवालों के जबाव"

Special Thanks to FTN (For The Nation) a wing of "Vidya Bharti Purva Chatra Parishad" 

अनुच्छेद-370 और उससे जुडी समस्याए


अनुच्छेद-370 का परिचय :-   

भारतीय संविधान का अनुच्छेद- 370 (Article 370) जम्मू एवं कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता है। यह धारा भारतीय राजनीति में बहुत विवादित रही है। संविधान में यह अस्थायी, विशेष, संक्रमणकालीन धारा के नाते सम्मिलित की गई। इसके अंतर्गत भारतीय संविधान की केन्द्रीय एवं समवर्ती सूची (Union and Concurrent List) में से भारतीय संसद केवल -

1. विदेश, संचार, सुरक्षा (आंतरिक सुरक्षा सहित) पर जम्मू-कश्मीर सरकार से सलाह कर कानून बना सकती है।

2. केन्द्रीय एवं समवर्ती सूची के शेष सब विषयों पर संसद द्वारा पारित कानून तभी लागू किये जा सकेंगे जब जम्मू-कश्मीर विधानसभा की सहमति प्राप्त होने के बाद राष्ट्रपति आदेश पारित करेंगे।

3. अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) भी जम्मू-कश्मीर राज्य के पास निहित रहेंगी।

4. भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।



म्मू-कश्मीर की संविधान सभा का 1951 में गठन किया गया। जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान अनुच्छेद-370 की उत्पत्ति है। जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान की धारा-1 और अनुच्छेद-370 लागू होने के कारण ही शेष संविधान यहां पर लागू करने का राष्ट्रपति द्वारा भी तब तक आदेश नहीं हो सकता था, जब तक कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा द्वारा अनुमोदन न कर दिया जाय। इसीलिये 1951 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा का गठन किया गया।

नुच्छेद 370(ए) में प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के अनुमोदन के पश्चात् 17 नवम्बर 1952 को भारत के राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-370 के राज्य में लागू होने का आदेश दिया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-35(ए) के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के जिन निवासियों (जो 1944 से पूर्व से यहां रहते थे) के पास स्थायी निवासी प्रमाण पत्र (Permanent Resident Certificate) होगा, वे ही राज्य में नागरिकता के सभी मूल अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे। इस कारण से शेष भारत के निवासी जम्मू-कश्मीर में न तो सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं और न ही जमीन खरीद सकते हैं। उनको राज्य के अंतर्गत वोट देने का अधिकार भी नहीं है।

अनुच्छेद-370 संविधान में क्यों जोड़ा गया :-

संविधान सभा में प्रस्ताव आने पर बिहार से आये संविधान सभा के प्रतिनिधि मौलाना हसरत मोहानी ने प्रश्न पूछा- यह भेदभाव क्यों? गोपालस्वामी अयंगार ने उतर दिया -कश्मीर की कुछ विशिष्ट स्थिति है, इसलिये विशेष व्यवस्थाओं की आज आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया-

1. जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतर्गत कुछ युध्द चल रहा है। युद्ध विराम लागू है, पर अभी सामान्य स्थिति नहीं है।

2. राज्य का कुछ हिस्सा आक्रमणकारियों के कब्जे में है।

3. संयुक्त राष्ट्र संघ में हम अभी उलझे हुये हैं, वहां कश्मीर समस्या का समाधान बाकी है।

4. भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को वादा किया है कि सामान्य स्थिति होने के पश्चात जनता की इच्छाओं के अनुसार अंतिम निर्णय किया जायेगा।

5. प्रजासभा का अब अस्तित्व नहीं है। हमने स्वीकार किया है कि राज्य की अलग से संविधान सभा द्वारा केन्द्रीय संविधान का दायरा एवं राज्य के संविधान का निर्णय किया जायेगा।

6. इन विशेष परिस्थितियों के कारण अस्थायी तौर पर इस अनुच्छेद-370 को संविधान में शामिल करने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट कहा गया है- "हम जम्मू-कश्मीर के लोगों ने एकमत से स्वीकार किया है, …… 26 अक्तूबर 1947 के जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के उपरांत पुनर्परिभाषित करते हैं कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,… हम भारत की एकता-अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध हैं।" वास्तव में यह आंतरिक आवश्यकता एवं तदनुरूप व्यवस्था थी। जब स्थितियां सामान्य हो गईं, संविधान सभा ने विलय प्रपत्र का अनुमोदन कर दिया, बार-बार राज्यों के चुनाव के उपरांत भारत के संविधान के अंतर्गत राज्य सरकारें काम करती रहीं, तो इस व्यवस्था को समाप्त होना ही चाहिए था।


अनुच्छेद 370 से जुडी समस्याए :-   

01 श्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी कि समस्याए :- 

1947 में जम्मू-कश्मीर में पश्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी (आज लगभग दो लाख) अभी भी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने ही खाली पड़ी सीमाओं की रक्षा के लिए यहां उनको बसाया था। इनमें अधिकतर हरिजन और पिछड़ी जातियों के हैं। इनके बच्चों को न छात्रवृति मिलती है और न ही व्यावसायिक पाठयक्रमों में प्रवेश का अधिकार है। सरकारी नौकरी, संपत्ति क्रय-विक्रय तथा स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान का भी अधिकार नहीं है। 63 वर्षों के पश्चात भी अपने ही देश में वे गुलामों की तरह जीवन जी रहे हैं।

शेष भारत से आकर यहां रहने वाले व कार्य करने वाले प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी भी इन नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित है। 30-35 वर्ष इस राज्य में सेवा करने के पश्चात भी इन्हें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा हेतु राज्य से बाहर भेजना पड़ता है और सेवानिवृति के बाद वे यहां एक मकान भी बनाकर नहीं रह सकते।

1956 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने जम्मू शहर में सफाई व्यवस्था में सहयोग करने के लिये अमृतसर (पंजाब) से 70 बाल्मीकि परिवारों को निमंत्रित किया। 54 वर्ष की दीर्घ अवधि के पश्चात भी उन्हें राज्य के अन्य नागरिकों के समान अधिकार नहीं मिले। उनके बच्चे चाहे कितनी भी शिक्षा प्राप्त कर लें, जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुसार केवल सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिये ही पात्र हैं। आज उनके लगभग 600 परिवार हैं लेकिन उनकी आवासीय कॉलोनी को भी अभी तक नियमित नहीं किया गया है।

2. मंडल आयोग की रिपोर्ट न लागू होने के कारण यहां (कश्मीर में ) पिछड़ी जातियों को आरक्षण नहीं है।:-

1947 से 2007 तक कश्मीर घाटी में हरिजनों को कोई आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के 2007 के निर्णय, जिसके अंतर्गत हरिजनों को कश्मीर घाटी में आरक्षण प्राप्त हुआ, को भी सरकार ने विधानसभा में कानून द्वारा बदलने का प्रयास किया, जो जनांदोलन के दबाव में वापिस लेना पड़ा।

  अनुसूचित जनजाति के समाज को राजनैतिक आरक्षण अभी तक प्राप्त नहीं है।


3. संपत्ति कर, उपहार कर, शहरी संपत्ति हदबंदी विधेयक (Wealth tax, Gift tax, Urban Land Ceiling Act)  आदि कानून लागू नहीं होते।

4.  शासन के विकेन्द्रीकरण और पंचायत सुधार से सम्बंधी समस्या :-

• 73 एवं 74 वें संविधान संशोधन को अभी तक लागू नहीं किया गया।
• गत 67 वर्षों में केवल 4 बार पंचायत के चुनाव हुए।
• पंचायत के सरपंच को कोई अधिकार नहीं है, वो केवल नाम मात्र के सरपंच है।

5. म्मू व लद्दाख को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और साथ में उनकी उपेक्षा ।:-

•  कानून की मनमानी व्याख्याओं के कारण जम्मू व लद्दाख को विधानसभा व लोकसभा में पर्याप्त       प्रतिनिधित्व नहीं है।

• जम्मू का क्षेत्रफल व वोट अधिक होने के बाद भी लोकसभा व राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम है।

• लेह जिले में दो विधानसभाओं का कुल क्षेत्रफल 46000 वर्ग किमी. है।

• सारे देश में लोकसभा क्षेत्रों का 2002 के पश्चात पुनर्गठन हुआ, परन्तु जम्मू-कश्मीर में नहीं हुआ।

6. विस्थापितों की भूमि बनी जम्मू :-

• गत 63 वर्षों से जम्मू विस्थापन की मार झेल रहा है। आज जम्मू क्षेत्र में लगभग 60 लाख जनसंख्या है जिसमें 42 लाख हिन्दू हैं।

•इनमें लगभग 15 लाख विस्थापित लोग हैं जो समान अधिकार एवं समान अवसर का आश्वासन देने वाले भारत के संविधान के लागू होने के 60 वर्ष पश्चात भी अपना अपराध पूछ रहे हैं। उनका प्रश्न है कि उन्हें और कितने दिन गुलामों एवं भिखारियों का जीवन जीना है।

7. पाकिस्तान अधिकृत पश्चिम कश्मीर (गिलकित और बाल्टिस्तान और (तथाकतित आज़ाद) पाक अधिकृत कश्मीर से आये शरणार्थी कि समस्याए :- 

1947 में लगभग 50 हजार परिवार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर से विस्थापित होकर भारतीय क्षेत्र स्थित जम्मू-कश्मीर में आये। आज उनकी जनसंख्या लगभग 12 लाख है जो पूरे देश में बिखरे हुए हैं। जम्मू क्षेत्र में इनकी संख्या लगभग 8 लाख है। सरकार ने इनका स्थायी पुनर्वास इसलिये नहीं किया कि पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर हमारे नक्शे में है, हमारा दावा कमजोर हो जायेगा, अगर हम उनको उनका पूरा मुआवजा दे देंगे। आज 63 वर्ष पश्चात भी उनके 56 कैंप हैं जिनमें आज भी वे अपने स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।

• जो मकान, जमीन उनको दी गई, उसका भी मालिकाना हक उनका नहीं है। उनका भविष्य और वर्तमान असुरक्षित है।

•1947 में छूट गई संपत्तियों एवं विस्थापित आबादी का ठीक से पंजीकरण ही नहीं हुआ फिर मुआवजा बहुत दूर की बात है।

• विभाजन के बाद पाक अधिगृहीत कश्मीर से विस्थापित हुए हिन्दू, जो बाद में देश भर में फैल गये, उनके जम्मू-कश्मीर में स्थायी निवासी प्रमाण पत्र ही नहीं बनते।

• विधानसभा में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के 24 क्षेत्र खाली रहते हैं। विधानसभा और विधान परिषद में इन विस्थापित होकर आये उस क्षेत्र के मूल निवासियों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिये जाने का प्रस्ताव अनेक बार आया है किन्तु इस पर सरकार खामोश है।

• इनके बच्चों के लिये छात्रवृत्ति, शिक्षा-नौकरी में आरक्षण आदि की व्यवस्था नहीं है।

8. श्मीरी अल्पसंख्य्क हिन्दू समुदाय कि समस्याए :-

• 1989-1991 में आये कश्मीर के हिन्दू यह महसूस करते हैं कि हम देश, समाज, सरकार, राजनैतिक दल – सभी के ऐजेंडे से आज बाहर हो गये हैं।

• 52 हजार पंजीकृत परिवारों की अनुमानित आबादी 4 लाख है। एक के बाद एक आश्वासन, पैकेज – पर धरती पर कुछ नहीं किया गया।

• 20 वर्ष पश्चात् भी धार्मिक-सामाजिक संपत्तियों के संरक्षण का बिल विधानसभा में पारित नहीं हुआ,

• राजनैतिक तौर पर विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 1991 में 1 लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता थे जो आज कम होकर 70 हजार रह गये हैं।

• विस्थापन के पश्चात उनके वोट बनाने और डालने की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण समाज की रूचि कम होती जा रही है।

• आज भी समाज की एक ही इच्छा है कि घाटी में पुन: सुरक्षित, स्थायी, सम्मानपूर्वक रहने की व्यवस्था के साथ सभी की एक साथ वापसी हो।

• जम्मू के आतंक पीड़ित क्षेत्रों के विस्थापित- कश्मीर घाटी के पश्चात जम्मू के डोडा, किश्तवाड़, रामबन, उधमपुर, रियासी, पुंछ, राजौरी, कठुआ जिलों के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह आतंकवाद आया, पर सरकार ने आज तक इन क्षेत्रों से आंतरिक विस्थापित लोगों की न तो गिनती ही की और न ही उनके लिये उचित व्यवस्था की। यह संख्या भी लगभग एक लाख है। आतंकवाद से प्रभावित लोगों की कुल संख्या तो लगभग 8 लाख है।

• सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात भी सरकार इनकी उपेक्षा कर रही है। जबकि ये वे लोग हैं जिन्होंने आतंकवाद से लड़ते हुये बलिदान दिये, स्थायी रूप से विकलांग हो गये। गांव-घर-खेत छोड़े, पर न धर्म छोड़ा और न भारत माता की जय बोलना छोड़ा। आज इनके बच्चे बिक रहे हैं, घरों एवं ढाबों में मजदूरी कर रहे हैं। पर उनके बारे में सोचने वाला कोई नहीं है।




कश्मीर के दो प्रमुख क्षेत्र जम्मू और लद्दाख कि लगातार उपेक्षा :- 

जम्मू से भेदभाव :- 

मताधिकार और प्रतिनिधित्व कि कमी :- जम्मू क्षेत्र के 26 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में 2002 की गणनानुसार 30,59,986 मतदाता थे। आज भी 2/3 क्षेत्र पहाड़ी, दुष्कर, सड़क-संचार-संपर्क से कटा होने के पश्चात भी 37 विधानसभा क्षेत्र हैं व 2 लोक सभा क्षेत्र। जबकि कश्मीर घाटी में 15,953 वर्ग किमी. क्षेत्रफल, 29 लाख मतदाता, अधिकांश मैदानी क्षेत्र एवं पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़ा, पर विधानसभा में 46 प्रतिनिधि एवं तीन लोकसभा क्षेत्र हैं।


जम्मू में जनसंख्या में धांधली- 2001 की जनगणना में कश्मीर घाटी की जनसंख्या 54,76,970 दिखाई गई, जबकि वोटर 29 लाख थे और जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 44,30,191 दिखाई गई जबकि वोटर 30.59 लाख हैं।

जम्मू में उच्च शिक्षा में धांधली- आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, पर प्रतियोगी परीक्षाओं में वहां के विद्यार्थियों का सफलता का प्रतिशत बढ़ता गया। इसके अलावा उच्च शिक्षा में एमबीबीएस दाखिलों में जम्मू का 1990 में 60 प्रतिशत हिस्सा था जो 1995 से 2010 के बीच घटकर औसत 17-21 प्रतिशत रह गया है। सामान्य श्रेणी में तो यह प्रतिशत 10 से भी कम है।

लद्दाख से भेदभाव :-   जम्मू-कश्मीर राज्य में लोकतांत्रिक सरकार के गठन के बाद से ही इस क्षेत्र के साथ भेदभाव किया जाता रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए पश्चिम बंगाल के गोरखालैंड की तर्ज पर लद्दाख के दोनों जिलों के संचालन हेतु ‘स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ का गठन किया गया लेकिन फिर भी इस क्षेत्र के साथ भेदभाव कम नहीं हुआ है।

कर्मचारी कि नियुक्ति में भेदभाव :-  वर्ष 1997-98 में के.ए.एस. और के.पी.एस. अधिकारियों की भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग ने परीक्षा आयोजित की। इन परीक्षाओं में 1 ईसाई, 3 मुस्लिम तथा 23 बौद्धों ने लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की। 1 ईसाई और 3 मुस्लिम सेवार्थियों को नियुक्ति दे दी गयी जबकि 23 बौद्धों में से मात्र 1 को नियुक्ति दी गयी। इस एक उदाहरण से ही राज्य सरकार द्वारा लद्दाख के बौद्धों के साथ किये जाने वाले भेदभाव का अनुमान लगाया जा सकता है।

कर्मचारियों की संख्या में उचित प्रतिनिधित्व नहीं :- राज्य सरकार के कर्मचारियों की संख्या 1996 में 2.54 लाख थी जो वर्ष 2000 में बढ़कर 3.58 लाख हो गई। इनमें से 1.04 लाख कर्मचारियों की भर्ती फारूख अब्दुल्ला के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुई। इनमें से 319 कर्मचारी यानी कुल भर्ती का 0.31 प्रतिशत लद्दाख से थे।

अन्य मुद्दे :- 

• अन्याय की चरम स्थिति तब देखने को मिलती है जब बौद्धों को पार्थिव देह के अंतिम संस्कार के लिए भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अनुमति नहीं मिलती। इसके लिए शव को करगिल की बजाय बौद्ध बहुल क्षेत्रों में ले जाना पड़ता है।

• स्थानीय संस्कृति सहित बौद्ध मंदिरों व अन्य ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण प्रदान किए जाने के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं।

• कश्मीर से नियंत्रित होने के कारण लद्दाख की भाषा और संस्कृति भी आज संकट में है। लद्दाख की स्थानीय भोटी भाषा एक समृद्ध भाषा रही है। संस्कृत के अनेक ग्रंथ भी मूल संस्कृत में अप्राप्य हैं किन्तु वे भोटी भाषा में सुरक्षित हैं।

• राज्य सरकार की उर्दू को अनिवार्य करने की नीति के कारण लद्दाख के आधे से अधिक विद्यार्थी लद्दाख से बाहर जा कर पढ़ने के लिये विवश हैं। जो न केवल लद्दाक कि संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहे है बाकि एक समृद्ध भाषा को भी विलुप्त कर रहे है (ध्यान रहे भोटी भाषा संविधान कि  14वीं अनुसूची में शामिल भी नहीं है।)


Special Thanks to FTN (For The Nation) a wing of "Vidya Bharti Purva Chatra Parishad" 



अनुच्छेद-370 पर कुछ प्रमुख प्रश्न

म्मू-कश्मीर के विषय में कांग्रेस की नीति पहले से ही अस्पष्ट थी। जम्मू-कश्मीर की गत 63 वर्षों की समस्या का कारण केवल कांग्रेस नेतृत्व की सरकारों द्वारा लिये गये निर्णय हैं। अब समय आ गया है कि देश की जनता को इन सवालों पर हर गली-मोहल्ले-चौक पर कांग्रेस के नेताओं से और विशेषकर नेहरू खानदान से निम्न सवाल करने चाहिए

1. 1946 में जम्मू-कश्मीर के लोकप्रिय महाराजा को हटाने के लिये नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन नेता शेख अब्दुल्ला ने ”कश्मीर छोड़ो” (Quit Kashmir) आंदोलन छेड़ा। आंदोलन घाटी के कुछ लोगों में ही सक्रिय था। वह देश की आजादी का समय था, ऐसे समय किसी भी रियासत में ऐसे आंदोलन का कोई औचित्य नहीं था। शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि देश की आजादी की घोषणा से पूर्व महाराजा उन्हें सत्ता हस्तांतरित करें। उसके अनुसार मुस्लिमबहुल होने के कारण हिन्दू राजा को मुस्लिमबहुल कश्मीर पर राज्य करने का अधिकार नहीं है। महाराजा हरिसिंह ने शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया।

यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है कि सांप्रदायिक विद्वेष एवं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर आधारित इस आंदोलन का समर्थन करने के लिए नेहरू जी ने जम्मू-कश्मीर आने की जिद क्यों की जबकि महाराजा हरिसिंह ने भी उनसे न आने का व्यक्तिगत अनुरोध किया, व कांग्रेस पार्टी ने भी उन्हें ऐसा करने से मना किया। नेहरू जी को कोहाला पुल पर रोक लिया गया एवं रियासत से वापिस भेज दिया गया। परिणामस्वरूप नेहरू जी हमेशा के लिए देशभक्त महाराजा हरिसिंह के विरोधी हो गये। वास्तव में 1931 की गोलमेज कॉन्फ्रेंस में महाराजा हरि सिंह की देशभक्तिपूर्ण भूमिका के कारण अंग्रेज उनसे नाराज थे। माउण्टबेटन ने कश्मीर के विलय को उलझा कर उनसे व्यक्तिगत बदला लिया जिसकी कीमत देश को आज तक चुकानी पड़ रही है।

2. हाराजा 26 अक्तूबर से पूर्व और संभवत: 15 अगस्त से पूर्व ही विलय के लिये तैयार थे, पर प्रश्न यह है कि नेहरू जी ने विलय के साथ आंतरिक शासन के लिये शेख अब्दुल्ला को सत्ता हस्तांतरण की जिद क्यों की, जबकि इसके लिये महाराजा कदापि तैयार नहीं थे.?

3. सी विषय पर समझाने के लिये गांधी जी भी जम्मू-कश्मीर महाराजा के पास क्यों आये?

4. विलय होने के पश्चात नेहरू जी एवं उनकी सरकार ने जनमत संगह कराने की अवैधानिक, एकतरफा घोषणा क्यों की ?

5. पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को खाली कराये बिना हम संयुक्त राष्ट्र संघ में 1 जनवरी, 1948 को क्यों गये ?

6. भारत की सेना आगे बढ़कर पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापिस लेना चाहती थी, परन्तु उसे अनुमति क्यों नहीं दी गई ? जबकि पाकिस्तान की सेना इतनी कमजोर थी कि वह प्रतिरोध भी नहीं कर सकती थी। जनवरी 1949 को युद्धविराम घोषित हुआ, भारतीय सेना को आगे बढ़ने का आदेश क्यों और किसने नहीं दिया?

7.मने संयुक्त राष्ट्र संघ में जनमत संग्रह का आश्वासन क्यों दिया?

8. पी.ओ.के. में 50 हजार हिन्दू-सिखों के नरसंहार का जिम्मेदार कौन है?

9. पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पी.ओ.के.) के लाखों शरणार्थी 63 वर्षों से विस्थापित कैंपों में ही रहते हैं। सरकार जबाव दे कि 63 वर्षों से पी.ओ.के. को वापिस लेने के लिये हमने क्या किया?

10. 1965 एवं 1971 में युध्द जीतने के बाद भी अपने क्षेत्र वापिस लेने के स्थान पर 1972 में शिमला समझौते में छम्ब का क्षेत्र भी हमने पाकिस्तान को क्यों दे दिया ?

11. संविधान सभा में जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व स्वाधीनता अधिनियम 1947, का उल्लंघन कर महाराजा हरिसिंह के स्थान पर शेख अब्दुल्ला की इच्छा के अनुसार नेशनल कांफ्रेंस के प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व देने के लिये संविधान सभा में प्रस्ताव क्यों लाया गया ? इसी कारण से संविधान निर्माण के समय शेख अब्दुल्ला को अनुच्छेद-370 के लिये दबाव बनाने का मौका मिला।

12. स्वाधीनता अधिनियम के अनुसार आंतरिक प्रशासक शेख अब्दुल्ला को महाराजा एवं प्रधानमंत्री की देख-रेख में ही सरकार चलानी थी पर वे बार-बार महाराजा हरिसिंह और प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन का अपमान करते थे। उनको समझाने के स्थान पर अवैधानिक ढंग से पहले मेहरचंद महाजन और फिर महाराजा हरिसिंह को हटाने का कार्य केन्द्र सरकार ने क्यों किया?

13.  1949 के प्रारंभ में ही शेख अब्दुल्ला की कुत्सित महत्वाकांक्षायें स्पष्ट होने लगी थीं और उन्होंने भारत सरकार पर दवाब की नीति प्रारंभ कर दी थी। फिर भी उन्हें हटाने के स्थान पर महाराजा हरिसिंह को ही राज्य से अपमानजनक ढ़ंग से हटाने का कार्य क्यों किया गया ?

14. भारत की संविधान सभा में प्रस्ताव लाकर जम्मू-कश्मीर नाम से जम्मू को हटाकर राज्य का नाम कश्मीर रखने का असफल प्रयास पं. नेहरू और गोपालस्वामी अयंगार ने क्यों किया?

15. डॉ. अंबेडकर, पूरी संविधान सभा, पूरी कांग्रेस पार्टी के विरोध के बाद भी अनुच्छेद-306(ए) (बाद में अनुच्छेद-370) लाने की जिद पं. नेहरू ने क्यों की?

16. र्म निरपेक्षता की नीति के बावजूद केवल मुस्लिमबहुल होने के कारण जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की नीति नेहरू ने क्यों बनाई?

17. शेख अब्दुल्ला की राष्ट्रविरोधी मांगों के आगे (1947-1953 तक) नेहरू जी बार-बार क्यों झुकते रहे?

18. पूरे लद्दाख एवं जम्मू में शेख अब्दुल्ला के विरोध के बाद भी कांग्रेस ने केवल शेख को ही जम्मू-कश्मीर का         नेता क्यों माना?

19. कांग्रेस ने 1953 में शेख को गिरफ्तार क्यों किया ? 1958 में उसे रिहा किया, पर कुछ महीनों बाद पुन: गिरफ्तार क्यों करना  पड़ा ?

20.सी क्या मजूबरी थी कि 1975 में बिना चुनाव के कांग्रेस का पूर्ण बहुमत होते हुये भी शेख अब्दुल्ला को ही मुख्यमंत्री बना दिया?

21. 1951 में संविधान सभा के चुनाव का नाटक हुआ। विपक्षी दलों के समस्त उम्मीदवारों के आवेदन रद्द कर दिये गये। 75 में से 73 सीटों पर नेशनल कांफ्रेंस के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गये। कांग्रेस लोकतंत्र की इस हत्या पर चुप क्यों रही ?

22. कांग्रेस ने ऑटोनामी (स्वायत्तता) के नाम पर शेख अब्दुल्ला के सामने घुटने क्यों टेके, जिसके अंतर्गत 1952 में पं. नेहरू ने निम्न बातों को स्वीकार किया-

• जम्मू-कश्मीर राज्य का अलग संविधान व अलग झंडा रहेगा। भारत के राष्ट्रीय ध्वज के समान ही जम्मू-कश्मीर के राज्य ध्वज को राज्य में सम्मान प्राप्त होगा।

• मुख्यमंत्री, राज्यपाल के स्थान पर जम्मू कश्मीर में सदरे रियासत (राज्य अध्यक्ष), वजीरे आजम (प्रधानमंत्री) कहलाये जायेंगे।

• स्थायी निवासी प्रमाण पत्र की व्यवस्था, जिसके द्वारा शेष भारत का व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में बस नहीं सकेगा, परन्तु जम्मू-कश्मीर का व्यक्ति देश में कहीं भी जाकर बस सकता है।

• सदरे रियासत का चुनाव जम्मू-कश्मीर की विधानसभा करेगी, राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की सलाह पर सदरे रियासत अर्थात राज्यपाल को नियुक्त नहीं कर सकेगा।

• सर्वोच्च न्यायालय का दखल कुछ ही क्षेत्रों में सीमित रहेगा।

• भारत का चुनाव आयोग, प्रशासनिक सेवा अधिकरण (आई.ए.एस एवं आई.पी.एस.), महालेखा नियंत्रक के अधिकार क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर नहीं रहेगा।

23. सीमापार और यहां तक कि कश्मीर घाटी में भी चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों, कश्मीर में आने वाले समय में पाकिस्तान की आतंकवाद फैलाने की योजनाओं, बढ़ते मदरसे, जमायते-इस्लामी की कट्टरवाद फैलाने की गुप्तचर रिपोर्टों की राजीव गांधी सरकार ने 1984 से 1989 तक अनदेखी क्यों की?

24. म्मू-कश्मीर में बार-बार चुनाव के नाम पर धोखाधडी होती रही, विशेषकर 1983 व 1987 के चुनाव के समय नेशनल कांफ्रेंस द्वारा की गई धांधलियों पर कांग्रेस चुप क्यों रहीं?

25. म्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट होने के बाद भी राष्ट्रवादी शक्तियों को मजबूत करने के स्थान पर अलगाववादी मानसिकता की नेशनल कांफ्रेंस, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को बढावा क्यों दिया गया?

26. कांग्रेस ने स्वयं अपने नेतृत्व को ही कश्मीर घाटी में कभी विकसित क्यों नहीं होने दिया ?

27. 1952 में नेहरू-शेख सहमति (दिल्ली प्रस्ताव), 1975 का शेख-इंदिरा समझौता, 1986 का राजीव-फारूक समझौता, और अब वर्तमान सरकार की पाकिस्तान व अलगाववादियों से पिछले 5 वर्षों से चल रही गुपचुप वार्ता और भविष्य की स्वायत्तता की संभावित योजनायें क्या यह नहीं दर्शातीं कि कांग्रेस की अलगाववादियों के सामने घुटने टेकने की नीति व मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण कश्मीर को अलग दर्जे की नीति ही कश्मीर की समस्या का वास्तविक कारण है ?


Special Thanks to FTN (For The Nation) a wing of "Vidya Bharti Purva Chatra Parishad" 

Sunday, September 29, 2013

Foundation of E-Revolution In India

Today India's telecommunication network is the Second largest in the world based on the total number of telephone users (both fixed and mobile phone). It has the world's Third-largest Internet user-base with over 137 Million as of June 2012. Major sectors of the Indian telecommunication industry are telephony, internet and television broadcasting. And all this is possible in last 2 Decade, mostly 2003 to 2007. We see how increase our telecommunication and Internet Industries. but what is the Foundation of this Growth ?

It wasn't always like this. before 1995 telecommunication and internet is available only in Mumbai, Delhi, Calcutta, Chennai and Pune only. but Next 10 year 1996 to 2005 is grow from 0.10% to 4.50% and this is available in all cities in India.. This is a start of big E-Revolution

How did this happened ? 

Answer :- this is possible because Indian Government of  Bharatiya Janata Party Led NDA Under the leadership of Atal Bihari Vajpayee take revolutionary steps to give boom to this sector. because of this people of India take various benefit of Information Technology in every sector. Outcome of this communication made easier and Cheaper in India.


                                
                                               Sources :-  Digital Market Overview

Major initiatives taken By NDA :- 

Many Major initiatives are taken that time like 


1) Restructuring of Telecom Regulatory Authority of India. who established with effect from 20th February 1997 by an Act of Parliament. 

2) Establish New Telecom Policy, 1999 


4) The Government done Corporatization of DoT on 1 October 2000. Department of Telecommunication Services (DTS) which was later named as Bharat Sanchar Nigam Limited (BSNL)

5) In April 2002, the government decided to cut its stake of 53% to 26% in Videsh Sanchar Nigam limited (VSNL) and to throw it open for sale to private enterprises. TATA finally took 25% stake in VSNL . 

6) Open our market for Private sector in communication sector.

This initiative are master stroke of Indian Government of Bharatiya Janata Party Led NDA. This was a Gateway to many foreign investors to get entry into the Indian Telecom Markets. After March 2000, the Government became more liberal in making policies and issuing licences to private operators. The government further reduced licence fees for Cellular Service Providers and increased the allowable stake to 74% for Foreign Companies. Because of all these factors, the service fees finally reduced and the call costs were cut greatly enabling every common middle-class family in India to afford a cell phone. Nearly 32 million handsets were sold in India. The data reveals the real potential for growth of the Indian Telecom Market.

Many private operators, such as Reliance Communications, Tata Indicom, Vodafone,  Airtel, Idea etc., successfully entered the high potential Indian Telecom Market. some of the companies also provide the WLL Service. The mobile tariffs in India have also become lowest in the world. A new mobile connection can be activated with a monthly commitment of US$ 0.15 only. because of this initiative Mobile and advanced technology go to the hands of Common Man in lowest Rate in India.

Goal of this Initiatives :-

1) Further accelerating the revolution in telecom connectivity, which began in 1999, the number of telephones will be increased from 7 crore at present to more than 30 crore by 2009. This will ensure that, on average, every alternate Indian family will have a telephone.

2) No Indian village will be without telecom services after 2007. Rural teledensity will be increased more than five-fold in five years. 

3) The number of Internet connections will be increased five-fold from 40 lakhs at present to 2 crore.

4) PCOs will be encouraged to become multi-purpose IT kiosks and serve as the e-interface between citizens and providers of services, including government services. These will create several lakh new employment opportunities. 

5) Broadband communication can revolutionize all sectors of the Indian economy. It can also bring about a paradigm change in the content and delivery of education and entertainment. Therefore, a comprehensive policy will soon be formulated to promote affordable broadband connectivity. This will embrace all the land-line and wireless phone users, cable TV homes, and cinema halls. Promotion of state-of-the-art wireless technologies will be a key part of this policy.

6) India's economy, government and education will be IT-enabled at all levels. Implementation of a national E-Governance strategy will begin before August 15, 2004. E-Seva will be made the common platform for citizens to pay bills for electricity, telephone, water, etc., register property, procure and submit government forms, etc. We will drastically reduce the need for citizens to go to a government office for services which can rendered electronically.

7) IT in Indian languages, including in the area of content creation, will be given special thrust.

8) Postal services will be revamped, modernized, and IT-enabled to provide a range of commercial and governmental services to the people.

9) Every high school and every college in the country will be given access to a high-speed Internet connection with access to rich educational content in local languages. 

Result of this initiatives :- 

India is the third biggest country in terms of internet users in the world
Growth of E-Commerce in India



                                   

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   



National Democratic Alliance "NDA"  Bharatiya Janata Party "BJP"  Ex Prime Minister Atal Bihari Vajpayee







Sunday, September 22, 2013

Issues of Internal Security (Challenges and Attitude of Government.)

On external security challenges in front of India is Cross border Terrorism, Underworld Mafia and Hidden and open enemy and against this we are ready to face it. Indian Armed Forces are fully capable to eliminated open enemy but in present day Definition of War is changed. We everyday facing many Crimes (Social or National). India faces a major threat is Terrorism, Naxalism, Left Extremism, Mafia, Cyber war and crimeInformer of Enemy's intelligence agency operates in India, second side Social Crime, Crime against woman's, Home Offenses and many others challenges are in front of Us. if we see on big crime or big challenge and any other Crimes we face them with old laws.

If we see crime statistics this is indicator to show reality of increasing crime in big cities of India. Like Mumbai is not too far behind Delhi on the violence scale. The financial capital of India accounted for 6.9% of total crimes committed in India in 2011, not too far behind the national capital, which accounts for 9.9% of the crime graph.

There were 47,212 crimes recorded in Delhi as compared to 32,647 in Mumbai only in a year. While crimes in Delhi rose by almost 3% percent since 2010, crimes in Mumbai dropped by nearly 4%, revealed Crime in India 2011 statistics supplied by the National Crime Records Bureau.


The latest edition of Crimes in India report published by the National Crime Record Bureau (NCRB) said that while the share of violent crimes of the total IPC crimes in the country was 11.5 percentAssam reported the highest rate (54.2 per cent), followed by Manipur (44.6)Kerala (42.7) and Delhi (34.7). Number-wise, however, Uttar Pradesh topped the chart with 33,824 violent crimes that accounted for 12.3 percent of total violent crimes in the Country and all this states is So Called Secular and Congress led states. who always say about Social Harmony.


Second side main opposition BJP led popular state Gujarat is lowest in crime rate. which are Infamous for so called Communalism. Under the Sumptuous Leadership of Narendra Modi Lowest Crime Rate in Surat and Vadodara in all Indian Cities.  
                          
         According :-  Statistics of National Crime Record Bureau 

 
A short film on Analyzing Maoism in India and Challenges of Internal securitys. This film show The Naxalite-Maoist insurgency is an ongoing conflict between Maoist groups, known as Naxalites or Naxals, and the Indian government.



What is root of problem ?

Answer :-

1   Indian Law against Criminal is based on Indian Penal Code,1860. His Enactment is made on 1860 under British rule in India. that's mean 153 year old law is recognised by government to fight against Criminal.

2    Indian Policing is follow to Indian Police Act 1861. this law also 152 year old and sleazy Act for Control policing on society.

3   Multiple Intelligence agency but no any coordination between them and also lack of information or confusion on indication.

4  Lack of advance information system, training and weapons.

5  Political intervention and down moral of intelligence agency for political benefit.

6  Main Problem is Lack of Appetency in Government to Control CriminalAntisocial and Anti-National element. they are every time disturb when Police take Action on this criminal.

I give you some example of Political Intervention

1   Political & Media Trial of Ishrat Jahan Case 
2   Political & Media Trial on Sohrabuddin Sheikh Case 
3   Dirty Politics on Batla House Encounter Case 
4   Political Controversy on Hanging of Afzal Guru 
5  Misuse of Central Bureau of Investigation 
6  Political made Controversy on Ex-General VK Singh 
7  Punishes Police Cops after Exposure of Government Involvement on Muzaffarnagar, UP Riots 
8  Speech for divided India in Delhi 2011 but no any reaction of Government on this serious matter.
Political Intervention In UP, Muzaffarnagar Riots

This type cheap political tactics are give bad impression on moral of security agency. And because of this automatically Increase Morale of criminals. and many more other cause of this situation. we need to change this.

What is Solution of Problem ?

Answer :-

1. Firstly we need a strong law against criminal. because Old Law is not effective on present internal security challenges. when we fight not only in border also in  the country with hidden enemy and this old law is not influential.

2. Police reform is must for Fighting with our various internal security challenges. Also we our give Police and internal security agency a strong and effective advance information system, training and weapons. Commonwealth Human Rights Initiative is give a report on Police reform.  SEVEN STEPS TO POLICE REFORM   

3. We have to stop police and internal security agency to make Puppet of Politicians. and we give him more Rights and Duties.

4. We need to develop strong communication channel between all security agency and policing. Whereby we not face confusion on indication and information.

Best Example of  Police Reform :-

Best Example of modernization of policing is Gujarat , State of India Under Decisive leadership of Narendra Modi . they give many initiative to modernization of policing and control crime rate last decade. because of Prudent initiative of Government crime rate in this state is too low. this is on record. government take many initiative to safety of woman's and To maintain Social Harmony. and also modernization of policing in Gujarat state. like because of this Government of Gujarat. spectacular efforts cities of Gujarat is make image as Safest and least safe Indian Cities for Women.

 Even Gujarat, considered to be the most prosperous Indian state, emerged as the most-secure for women.

Some major Initiative by government of Gujarat on Police reforms and issues of  internal security.

1Women Emergency Helpline by Gujarat Police 1091 
2eGujCop project for Modernization of Gujarat Police 
3Raksha Shakti University project established in 2009.

This type initiative are helpful for safety of our society. and we have do everything to encourage Police and Internal security. because if Indian Army is fighting on border then Indian Police and various Internal Security Agencies are fight with enemy of society.







India , Challenges of Internal Security In India ,  Terrorism , Underworld Mafia , Cyber War , Naxalism & Left Extremism , National Crime Records Bureau , Muzaffarnagar Riots ,Secular , Congress ,Bharatiya Janata Party (BJP) ,  Gujarat , eGujCop Project , Narendra Modi , Ex-General Vijay Kumar Singh