जम्मू-कश्मीर रियासत, जिसका विलय
26 अक्तूबर 1947 को भारतीय संघ में हुआ, वह आज के भारत द्वारा शासित जम्मू-कश्मीर राज्य से कहीं अधिक विशाल था। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर रियासत के निम्न हिस्से हैं :-
एक परिचय जम्मू और कश्मीर क्षेत्र का
1. जम्मू - इसका क्षेत्रफल कुल 36,315 वर्ग कि.मी. है जिसमें से आज हमारे पास लगभग 26 हजार वर्ग कि.मी. है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से युक्त पीर पंजाल पर्वत के दक्षिण में इस क्षेत्र में तवी और चेनाब जैसी बारहमासी नदियां बहती हैं। यहां की वर्तमान जनसंख्या का लगभग 67 प्रतिशत हिन्दू है। मुख्य भाषा डोगरी व पहाड़ी है।
2. कश्मीर घाटी- लगभग 22 हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल, जिसमें से लगभग 16 हजार वर्ग कि.मी. ही हमारे पास है। वर्तमान में अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम है, लगभग 4 लाख हिन्दू वर्तमान में कश्मीर घाटी से विस्थापित हैं। जेहलम और किशनगंगा नदियों में जाने वाली जलधाराओं से बना यह क्षेत्र दो घाटियों जेहलम घाटी एवं लोलाब घाटी से मिलकर बना है। मुख्यत: कश्मीरी भाषा बोली जाती है, परन्तु एक तिहाई लोग पंजाबी-पहाड़ी बोलते हैं।
3. लद्दाख क्षेत्र- कुल 1,01,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र, जिसमें से लगभग 59 हजार वर्ग कि.मी. भारत के अधिकार में है। प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ ही बड़ी संख्या में बौद्ध मठ यहां हैं जहां दुनिया के कोलाहल से दूर शांति का अनुभव किया जा सकता है। गॉडविन आस्टिन (K 28611 मीटर) और गाशरब्रूम I (8068 मीटर) सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ हैं। यहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क एवं कठोर है। वार्षिक वृष्टि 3.2 इंच तथा वार्षिक औसत ताप 5 डिग्री सें. है। नदियाँ दिन में कुछ ही समय प्रवाहित हो पाती हैं, शेष समय में जमी रहती है। सिंधु मुख्य नदी है। उत्तर में कराकोरम पर्वत तथा दर्रा है। कारगिल में 9000 फुट से लेकर कराकोरम में 25000 फुट ऊंचाई तक की पर्वत श्रंखलायें है।
01 जुलाई 1979 को लद्दाख का विभाजन कर लेह और करगिल; दो जिलों का गठन किया गया। पश्चिम बंगाल के गोरखालैंड की तर्ज पर दोनों जिलों का संचालन ‘स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ द्वारा किया जाता है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, लद्दाख की कुल जनसंख्या 236539 और क्षेत्रफल 59146 वर्ग कि.मी. है। यह भारत के सबसे विरल जनसंख्या वाले भागों में से एक है।
4. गिलगित-वाल्टिस्तान- जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने विधिवत अपना प्रांत घोषित कर उसका सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया है। यह लगभग 63 हजार वर्ग किमी. विस्तृत भू-भाग है जिसमें गिलगित लगभग 42 हजार वर्ग किमी. व वाल्टिस्तान लगभग 20 हजार वर्ग किमी. है। गिलगित का सामरिक महत्व है। यह वह क्षेत्र है जहां 6 देशों की सीमाएं मिलती हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, चीन, तिब्बत एवं भारत। यह मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया में प्रभुत्व रखा जा सकता है।
अमेरिका भी पहले गिलगित पर अपना प्रभाव रखना चाहता था और एक समय चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिये सोवियत रूस की भी ऐसी ही इच्छा थी, इसलिये 60 के दशक में रूस ने पाकिस्तान का समय-समय पर समर्थन कर गिलगित को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया था। वर्तमान में गिलगित में चीन के 11000 सैनिक तैनात हैं। पिछले वर्षो में इस क्षेत्र में चीन ने लगभग 65 हजार करोड़ रूपये का निवेश किया व आज अनेक चीनी कंपनियां व कर्मचारी वहां पर काम कर रहे हैं।
1935 में जब सोवियत रूस ने तजाकिस्तान को रौंद दिया तो अंग्रेजों ने गिलगित के महत्व को समझते हुये महाराजा हरिसिंह से समझौता कर वहां की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने के लिये 60 वर्ष के लिये इसे पट्टे पर ले लिया। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने इसकी सुरक्षा के लिये महाराजा को वापिस कर दिया।
राज्य में लोकसभा की 6 और विधानसभा की 87 सीटें हैं जिसमें लद्दाख में लोकसभा की एक और विधानसभा की 4 सीटें हैं। करगिल और लेह जिले में विधानसभा की दो-दो सीटें है; जिनके नाम क्रमशः जांस्कर व कारगिल और नोब्रा व लेह है। दोनों जिले करगिल और लेह लद्दाख लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या 65 लाख से ज्यादा है; जिसमें करीब 1,52,339 मतदाता लद्दाख में हैं।
करगिल के मुसलमान पक्के देशभक्त माने जाते हैं और 1999 में पाकिस्तान द्वारा कारगिल घुसपैठ के दौरान उन्होंने भारतीय सेना का खुलकर साथ दिया था। लद्दाख को चीन पश्चिम तिब्बत कहता है और सिन्धु नदी तक अपनी सीमा को बढ़ाना चाहता है। 1950 से ही इस क्षेत्र पर उसकी नजर है। लेह, जंस्कार, चांगथांग, नुब्रा, यह चार घाटियां बौध्दबहुल व सुरू घाटी पूर्णतया मुस्लिम बहुल है।
1947 में स्वाधीनता के समय जम्मू-कश्मीर कि स्थिति :-
1. भारत की पांच ऐसी रियासतों में से एक, जिसकी व्यवस्था सीधे ही भारत के वायसराय गवर्नर जनरल देखते थे। अंग्रेजों ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा (हरिसिंह बहादुर) के लिये 21 तोपों की सलामी की मान्यता दे रखी थी। ऐसी ही व्यवस्था मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर व हैदराबाद के शासकों के लिये थी।
2. भारत की सबसे बड़ी रियासत थी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 2 लाख 22 हजार वर्ग किमी. था। यह क्षेत्रफल बम्बई प्रेजीडेंसी से 2/3 अधिक एवं बीकानेर, ग्वालियर, बड़ौदा व मैसूर चारों रियासतों को कुल मिलाकर भी उनसे अधिक था।
3. यह भारत की एकमात्र रियासत थी जो मुस्लिम बहुल (लगभग 76 प्रतिशत) थी परन्तु जिसमें हिन्दू राजा था। इसके विपरीत देश में ऐसी बहुत सी रियासतें थीं जो हिन्दू बहुल थीं परन्तु मुस्लिम शासक द्वारा शासित थीं। सामान्यत: डोगरा शासक न्यायसम्मत तथा सुसंगत शासन के कारण जनता में लोकप्रिय थे।
4. इस रियासत की सीमायें अफगानिस्तान, तजाकिस्तान (तत्कालीन सोवियत संघ), चीन व तिब्बत से मिलती थीं।
5. अंग्रेजों ने एक अनियमित सैनिक बल गिलगित स्काउटस का भी गठन किया।
जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय :-
17 जून 1947 को
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। 18 जुलाई को इसे शाही स्वीकृति मिली जिसके अनुसार
15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तथा उसके एक भाग को काट कर नवगठित राज्य पाकिस्तान का उदय हुआ।
पाकिस्तान के अधीन पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत एवं सिंध का भाग आया। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहा शेष भू-भाग भारत के साथ रहा।
इस अधिनियम से ब्रिटिश भारत की रियासतें अंग्रेजी राज से तो मुक्त हो गईं, परन्तु उन्हें राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला और उन्हें यह सुझाव दिया गया कि भारत या पाकिस्तान में जुड़ने में ही उनका हित है। इस अधिनियम के लागू होते ही रियासतों की सुरक्षा की अंग्रेजों की जिम्मेदारी भी स्वयमेव समाप्त हो गई।
भारत शासन अधिनियम 1935, जिसे
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 में शामिल किया गया, के अनुसार
विलय के बारे में निर्णय का अधिकार राज्य के राजा को दिया गया। यह भी निश्चित किया गया कि कोई भी भारतीय रियासत उसी स्थिति में दो राष्ट्रों में से किसी एक में मिली मानी जायेगी, जब गवर्नर जनरल उस रियासत के शासन द्वारा निष्पादित विलय पत्र को स्वीकृति प्रदान करें। और साथ में
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 में सशर्त विलय के लिये कोई प्रावधान नहीं था।
26 अक्तूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने भारत वर्ष में जम्मू-कश्मीर का विलय उसी वैधानिक विलय पत्र के आधार पर किया, जिसके आधार पर शेष सभी रजवाड़ों का भारत में विलय हुआ था तथा भारत के उस समय के गवर्नर जनरल माउण्टबेटन ने उस पर हस्ताक्षर किये थे…. ”मैं एतद्द्वारा इस विलय पत्र को स्वीकार करता हूं” दिनांक सत्ताईस अक्तूबर उन्नीस सौ सैंतालीस (27 अक्तूबर-1947)
Full Text of Accession Merger-related information
कश्मीर के भारत संघ में विलय का पत्र
महाराजा हरिसिंह द्वारा हस्ताक्षरित जम्मू-कश्मीर के विलय पत्र से संबंधित अनुच्छेद, जो कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को पूर्ण व अंतिम दर्शाते हैं।
विलय पत्र में अनुच्छेद-1 के अनुसार, जम्मू-कश्मीर भारत का स्थायी भाग है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है। भारत संघ कहने के पश्चात दी गई राज्यों की सूची में जम्मू-कश्मीर क्रमांक-15 का राज्य है।
भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 के अनुसार शासक द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त आपत्ति करने का अधिकार पंडित नेहरू, लार्ड माउण्टबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना, इंग्लैंड की महारानी, इंग्लैंड की संसद तथा संबंधित राज्यों के निवासियों को भी नहीं था।
जब कश्मीर का विलय जो भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 के अनुरूप था और जिसका विरोध और उसमे बदलाव का अधिकार किसी को नहीं था तथा विलय के मुख्य अधिकारी और प्रमुख निर्णय-कर्ता वहाँ के महाराज थे और पूरी सहमति से ये विलय भारत में हुआ तो उस विलय को पूर्ण माना जाना चाहिए।
अर्थात कश्मीर का पूर्ण विलय भारत गणराज्य में भारत के संविधान के निर्माण से पहले हो चूका था। भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर, 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 से प्रभावी हुआ।तो क्यों भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को सामने लाया गया ?
साथ में इन लिंक भी देखे :-
01. अनुच्छेद-370 और उससे जुडी समस्याए
02. अनुच्छेद-370 पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कुछ प्रश्न "देश चाहता है इन सवालों के जबाव"
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