मोहन दास करमचंद गांधी अर्थात महात्मा गांधी जो कुछ समय तक राष्ट्र पिता के नाम से विख्यात थे हालाँकि भारत के संविधान या किसी और जगह ये नहीं लिखा है कि वो राष्ट्र पिता है। लिखा हो या न हो वो हमेशा ही राष्ट्र पिता रहेंगे। पर इसका गांधी जी के नाम से विख्यात गांधी टोपी से क्या लेना देना ? आप यही सोच रहे होंगे।
तो चलिए पड़ताल करते है कि कैसे एक नाम गांधी टोपी को भारत कि राजनीती ने कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। गांधी टोपी कि शुरुवात में गांधी जी का कोई योगदान नहीं है इसको स्पष्ट कर ले वो क्या है । मेने नहीं सुना कि उन्होंने ये टोपी पहनी या नहीं जहाँ तक मुझको मालूम है नहीं पहनी। पर कई लोगो ने और कई खानदानो ने इसको पहन कर लोगो को खूब टोपी पहनाई लगभग स्व्तंत्रता से जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी है और आज भी बहुत सफल है। लोगो ने इसको पहना तो पर वो उसके मूल विचार को नहीं समझ पाये।
समय के साथ हम गांधी के विचार को भूले और साथ में उनकी टोपी भी Out of Fashion हो गयी लोग समझदार हो गए भाई पर टोपी तो बेचना भी थी और पहनाना भी तो एसे में एक नए गांधी का अवतरण हुआ 2009-10 के इस युग में इस टोपी को अण्णा टोपी के नाम से जाना जाने लगा। शुक्र है टोपी बनाने वाले और टोपी पहनाने वाले लोगो का Business फिर शुरू हो गया। नहीं तो शायद ये टोपी भी गांधी के विचारो कि तरह भुला दी जाती अब एक नयी Generation नयी Style से टोपी पहन रही थी और इस बार अच्छे अच्छो को टोपी पहना रही थी। पर कुछ कमी रह गयी शायद जिसके नाम पर ये टोपी बनी उसने खुद भी पहन ली।
पर 2012-13 के बाद से तो इस टोपी का जैसे स्वर्णिम युग आ गया नए नए नाम मिलने लगे "कभी में हूँ अण्णा" कभी "मै हूँ आम आदमी" कभी "मै हूँ केजरीवाल" कभी "मै हूँ असली आम आदमी" हर टोपी का नया नाम पर काम वही दुसरो को टोपी पहनाना। कभी अण्णा ने ये इसको पहन कर पुरे तंत्र को टोपी पहनने पर मजबूर कर दिया था अब नयी टोपी धारी नयी Style से लोगो को टोपी पहना रहे है। खेर इस टोपी के नीचे बहुत चहरे है और बहुत से असली है और बहुत से नकली ये आप को तय करना है खेर टोपी टोपी तो बहुत हो गया।
अब जरा इस टोपी के मूल को समझते है। गांधी टोपी जो वास्तविकता में गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार , वेस्ट बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाको में पहले से पहनी जाती थी उसको गांधी जी का नाम मिला पर क्यों ? जहाँ तक मुझको लगता है इसका कारन गांधी जी का स्वदेशी प्रेम जो अपने देश में निर्मित वस्तु को प्राथमिकता देते थे। जहाँ तक मैने इतिहास पढ़ा है उस समय भारत का उद्योग में बहुत बड़ा हिस्सा जहाँ तक मैने इतिहास पढ़ा है उस समय भारत का उद्योग में बहुत बड़ा हिस्सा का कोई विकास नहीं था हम कच्चा माल वो चाहे किसी भी रूप में हो उसको बाहर भेज रहे थे और उस समय कि अंग्रेजी सरकार से उस कच्चे माल का परिपक्व रूप में उपयोग कर रहे थे। और जहाँ तक मेरी जानकारी है उस समय भारत में ओद्योगिक क्षेत्र में वस्त्र उद्द्योग ही एक मात्र सहारा था जो पूरी तरह बर्बाद हो रहा था और यही क्षेत्र है जहाँ निम्न आय वर्ग के लोग काम कर रहे थे। गांधी टोपी के मूल में मुझको खादी उद्द्योग को बचाने और उसको विस्तार देना एक उद्देश्य हो सकता है। मेरे कहने का मतलब है भारत में निर्मित वस्तुओ को प्राथमिकता देना। तब खादी वस्त्र एक Icon था भारत के ओद्योगिक क्षेत्र का और इस टोपी में मुझको देश के स्वदेशी तत्व को बचाने का कारण अधिक नज़र आता है।
यही एक मूल चीज है जिसको आज तक टोपी पहनने वाले और पहनाने वाले समझ नहीं पा रहे। यदि आज भी हम देखे तो हमारी क्षमता आज भी कम नहीं है पर हम और हमारे टोपी वाले इस पर ध्यान नहीं दे रहे। आज भी विकास के लिए हमको इस स्वदेशी तत्व को प्रोत्साहित करना जरुरी है। पर अब ये टोपी वाला नुस्खा नहीं चलेगा इसके लिए कदम उठाने होंगे। आज का कोई टोपी वाला इस मुद्दे पर नहीं बोल रहा जो एक चिंता का कारण है।
भारत में असली निवेश वो नहीं है जो कोई दूसरा देश हमारे देश में अपने सम्पदा लगाये। असली निवेश तो वो होगा जब भारत में निर्मित वस्तु विदेश में जाये और अपने नाम और गुणवत्ता के दम पर भारत में धन लाये वो असली निवेश है।
